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समाज के लिए खतरे की घंटी है युवाओं का डिप्रेशन, आंकड़े जानकर चौंक जाएंगे आप…

समाज के लिए खतरे की घंटी है युवाओं का डिप्रेशन, आंकड़े जानकर चौंक जाएंगे आप…

नई दिल्ली । दिल्ली के नजदीक हरियाणा के पलवल में छह लोगों की हत्या के आरोपी नरेश धनखड़ के वाकये ने हमारे समाज का ध्यान एक बार फिर उन मानसिक समस्याओं की तरफ खींचा है जिन्हें अव्वल तो कोई बीमारी नहीं माना जाता। अगर मान भी लिया जाए तो उसके इलाज में वैसी गंभीरता नहीं दिखाई जाती जिससे किसी समस्या की आशंकाओं को कम किया जा सके।

इसिलए होती हैं घटनाएं

अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस कहती है कि हरेक व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है, इसका पता नहीं लगा सकती है। निश्चित ही, सबूतों और तथ्यों के आधार तफ्तीश करने और दोष साबित कर अपराधी को सजा दिलाने का काम उसका है, मन की पड़ताल करना नहीं, लेकिन जो परिवार और समाज ऐसे मानसिक रोगियों के करीब होता है, उसे बेरोजगारी और पारिवारिक तनावों के चलते कुंठाग्रस्त-हताश लोगों की जानकारी पहले से हो जाती है। उन्हें यह आशंका भी सताने लगती है कि ऐसे लक्षण दिखा रहा व्यक्ति कहीं किसी दिन ऐसा हंगामा नहीं खड़ा कर दे, जिससे पूरे समाज को दिक्कत हो जाए। मगर इसके बावजूद वहां ऐसी कोई गंभीर कोशिश नहीं होती जिससे ऐसी घटनाएं वक्त रहते रोकी जा सकें। यही वजह है कि ऐसी घटनाएं बार-बार होती रहती हैं।

सफलता-असफलता के बीच का समय

करीब तीन साल पहले तेलंगाना में हुए ऐसे ही हादसे को ही देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि इनमें कितनी समानताएं रहती हैं। 2015 की शुरुआत में तेलंगाना में अवसाद से पीड़ित 26 साल के एक सिख युवक बलविंदर ने तलवार से 22 लोगों को घायल कर दिया था। उस पर काबू पाने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी जिसमें वह मारा गया। पता चला था कि तेलंगाना के करीमनगर कस्बे का निवासी बलविंदर पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। उसका वेतन डेढ़ लाख रुपये महीने था। पर इतना शानदार वेतन पाने के बावजूद वह इसलिए अवसादग्रस्त हो गया था क्योंकि सिविल सर्विस परीक्षा में वह नाकाम हो गया था। उसका थोड़ा-बहुत इलाज भी चल रहा था, लेकिन लोकसेवा परीक्षा की असफलता ने उसके दिमाग पर इतना गहरा असर डाला था कि वह काबू से बाहर हो गया।

चौंका देने वाले आंकड़े

यह एक स्थापित तथ्य है कि बेरोजगारी कई समस्याओं की जड़ है, पर रोजगार में लगे युवाओं की निराशा के भी भयानक परिणाम निकल रहे हैं। ऐसी घटनाएं असल में रोजगार की मुश्किलों के कारण लोगों में बढ़ती निराशा और अवसाद की स्थितियों का खुलासा करती है। इससे जो समस्या पैदा हो रही है, उससे संबंधित एक आंकड़े का खुलासा कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन गृह राज्यमंत्री हरिभाई पारथीभाई चौधरी ने देश की संसद में किया था। एक सवाल के लिखित जवाब में उन्होंने राज्यसभा को बताया कि 2014 में रोजगार संबंधी समस्याओं के चलते रोजाना करीब 3 लोगों ने आत्महत्या की। उस वर्ष व्यवसाय और रोजगार से जुड़ी समस्याओं के कारण घोर निराशा में घिरे 903 लोगों ने आत्महत्या की थी।

हालांकि देश में कई अन्य कारणों से आत्महत्या करने वालों की तादाद भी बढ़ रही है। अवैध संबंधों के संदेह में या समाज में बदनामी के कारण और प्रेम प्रसंगों में मिली नाकामी की वजह से भी हर साल कई हजार युवा मौत को गले लगा रहे हैं। जैसे 2014 में 4,168 युवाओं ने प्रेम में असफल होने के बाद अपनी जान दे दी। पर रोजगाररत लोग भी आत्महत्या कर लें या अवसाद में दूसरों की जान लेने की हद तक चले जाएं तो यह हमारे समाज के लिए चिंता की बात है।

युवा होते अवसाद के शिकार

नरेश धनखड़ और बलविंदर से जुड़ी घटनाएं इस मामले में एक उदाहरण बन सकती हैं। इन दोनों मामलों में यह पता चला है कि ये लोग किसी न किसी कारण से अपनी नौकरियों से संतुष्ट नहीं थे। नौकरियों में जिस तरह का दबाव और तनाव बढ़ा है, उसमें लोगों का कोई अतिवादी कदम उठा लेना आश्चर्यजनक होने के बावजूद अस्वाभाविक नहीं लगता। इसी तनाव और काम के दबाव के कारण युवा या तो तेजी से नौकरियां बदलते हैं या फिर किसी और रोजगार की तरफ मुड़ जाना चाहते हैं। इसमें भी जब वे सफल नहीं होते तो आत्महत्या करने या मानसिक रोगी बनकर अवसाद झेलने जैसे विकल्प उनके पास बचते हैं।

देश में आत्महत्या के बारे में जो आंकड़े खुद सरकारी एजेंसियां जारी करती हैं, वे इसलिए ज्यादा चौंकाते हैं क्योंकि अब महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज्यादा बड़ी तादाद में ऐसा कर रहे हैं और इनमें भी युवाओं का प्रतिशत सबसे ज्यादा है। इससे जुड़ी एक विडंबना यह भी है कि आत्महत्या का प्रतिशत देश के विकसित कहे जाने वाले राज्यों में ज्यादा है। मसलन पंजाब और हरियाणा में आत्महत्याओं का प्रतिशत देश के औसत से कहीं ज्यादा है। मगर ज्यादा चिंता युवाओं के अवसाद और आत्महत्या की है। घटनाओं और आंकड़ों का आकलन यह दर्शाता है कि जीवन के ऊंचे लक्ष्यों को पाने की होड़ के कारण युवाओं में हताशा का भाव पैदा हो रहा है।

आर्थिक नीतियां भी हैं जिम्मेदार

युवाओं की निराशा की एक वजह यह हो सकती है कि देश में जो आर्थिक नीतियां पिछले कुछ दशकों में अपनाई गई हैं, उनमें युवाओं को रोजगार संबंधी लक्ष्य पूरे नहीं हो रहे हैं। कहने को तो इन नीतियों के कारण कुछ युवाओं को अच्छा वेतन मिल रहा है, पर इसके बदले में उन्हें जानलेवा तनाव और बेतहाशा काम के दबाव से गुजरना पड़ रहा है। यह भी कहा जा सकता है कि आज के युवाओं में धैर्य की कमी है जिस कारण हालात से जूझने का उनका जोश ठंडा पड़ गया है।

हालांकि समाजशास्त्री इसके पीछे कुछ और कारणों को जिम्मेदार मानते हैं। उनके मत में युवाओं की हताशा का एक कारण यह भी वे अपने महत्वाकांक्षाओं और कठोर यथार्थ में सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली और नई संस्कृति की चमकदमक उन्हें लुभाती है, लेकिन उसके लिए संसाधन जुटा पाने का मौका उन्हें हमारी व्यवस्था में सहज ढंग से नहीं मिल पाता है। जिस तरह से हर तीन आत्महत्याओं में एक 15 से 29 वर्ष के युवा कर रहे हैं। कहा जा सकता है कि युवा समाज के लिए यह रुझान खतरनाक है। यह समाज के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि अवसाद की गर्त में जाने वाली या मौत को गले लगाने वाली पीढ़ी ही देश की नई उम्मीद है।

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