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किन्नरों की भावनाएं भित्तिचित्रों में उजागर…

किन्नरों की भावनाएं भित्तिचित्रों में उजागर…

नई दिल्ली | कोई विरोध नहीं है, नारों वाली तख्तियां नहीं हैं, बल्कि रंगों को लेकर कोलाहल सा मचा हुआ है। किन्नरों का एक समूह अपनी भावनाओं को जाहिर करने, अपने अधिकारों की मांग करने और भित्तिचित्रों के जरिए दुनिया को अपनी रचनात्मक प्रतिभा दिखाने के लिए सड़कों पर उतर आया है।

यह चेन्नई की अरावनी आर्ट परियोजना का परिणाम है, जिसे डॉक्युमेंट्री निर्माता पूर्णिमा सुकुमार ने करीब दो साल पहले एक प्रयोग के तौर पर शुरू किया था, उन्हें इसका अच्छी तरह आभास भी नहीं था कि जल्दी ही यह किन्नर समुदाय के लिए समाज में अपनी जगह खुद बनाने के लिए एक बड़ा मंच बन जाएगा।

पूर्णिमा ने चेन्नई से आईएएनएस को फोन पर बताया, “डॉक्युमेंट्री पर काम करने के दौरान मैं किन्नर समुदाय के कई लोगों से मिली और महसूस किया कि मुझे उन लोगों के लिए कुछ करना चाहिए या उन लोगों को अपनी बात रखने के लिए एक मंच प्रदान करना चाहिए। मैं भी एक भित्ति चित्रकार हूं तो मैं कुछ ऐसी चीज करने कूद पड़ी, जिसमें मैं भी सहज थी।”

किन्नर! यह नाम कैसे आया? पौराणिक कहानियों में कहा गया है कि महाभारत का युद्ध शुरू होने से पहले कृष्ण की सलाह पर युद्ध में विजय सुनिश्चित करने के लिए पांडवों ने मानव बलि देने का फैसला किया था।

बलि के लिए अर्जुन के पुत्रों में से एक अरावन को चुना गया, जिसका जन्म राजकुमारी चित्रांगदा से हुआ था, लेकिन पहले वह विवाह करना चाहता था तो कृष्ण ने मोहिनी का रूप धरकर उससे विवाह किया और अगले दिन अरावन ने बलि के लिए खुद को पेश कर दिया। अरावन किन्नर समुदाय के उन देवताओं में से एक हैं, जिन्हें पूजा जाता है।

यह परियोजना वर्तमान में चेन्नई, मुंबई, बेंगलुरू और पुणे में रहने वाले चार सदस्यों द्वारा संचालित की जाती है, जो स्थानीय किन्नर समुदाय को भित्तिचित्र बनाने में शामिल करने का काम करते हैं।

पूर्णिमा ने इस बात का जिक्र किया कि अरावनी कला परियोजना सिर्फ पेशेवर भित्तिचित्र कलाकारों के लिए नहीं है, बल्कि वे किसी के लिए भी एक सहज दोस्ताना माहौल में काम करने की जगह बनाने में विश्वास करती हैं, जिसने बेंगलुरू, मुंबई, जयपुर, चेन्नई, पुणे और यहां तक श्रीलंका के कोलंबो की सड़कों पर भी अपनी छाप छोड़ी है।

उदाहरण के लिए बेंगलुरू की एक कार्यकर्ता व किन्नर शांति जो एक रेडियो जॉकी के तौर पर काम कर रही थीं और अपने जीवन में मुशिकल दौर से गुजर रही थीं, अपनी भावनाओं को जाहिर करने के लिए एक माध्यम की तलाश में थी, जो लंबे समय से उनके अंदर दबी हुई थी और अरावनी कला परियोजना ने उनके जीवन में रंग भर दिया, जिसने उन्हें अपने कलात्मक पक्ष को सड़कों और दीवारों पर उभारने का मौका दिया।

शांति ने आईएएनएस को फोन पर बताया, “कला और सक्रियतावाद को संयोजित किया जा सकता है। कला निश्चित रूप से समुदाय के प्रति लोगों के नजरिए में बदलाव ला सकती है। हम विरोध में विश्वास नहीं करते, लेकिन चुपचाप से लंबे समय से हो रहे भेदभाव के खिलाफ कला के जरिए आवाज बुलंद कर रहे हैं। समाज इसे देख सकता है और उन पर तुरंत प्रभाव डाल सकता है। किन्नर समुदाय के लोगों को यौनकर्मी या भिखारी समझा जाता है।”

शांति की तरह शोनाली भी परियोजना की स्थापना के बाद से इससे जुड़ी हुई हैं। उनके लिए यह दीवारों पर सिर्फ अपनी कल्पनाओं को अभिव्यक्त करने का मौका नहीं, बल्कि जागरूकता की आवश्यकता को व्यक्त करने का तरीका भी है, पहले किन्नर समुदाय में और फिर समाज में।

शोनाली ने आईएएनएस को पुणे से फोन पर बताया, “हम समुदाय को उनकी खुद की क्षमताओं से परिचित कराना और जागरूक बनाना चाहते थे, जब तक किन्नर अपनी क्षमताओं के प्रति जागरूक नहीं होते, तब तक समुदाय में परिवर्तन लाना संभव नहीं है।”

पूर्णिमा सुकुमार के लिए परियोजना शुरू करने के बाद की राह आसान नहीं थी। उनकी पहली चुनौती समुदाय का विश्वास जीतना था।

उन्होंने बताया कि जब किन्नरों के साथ उन्होंने इस विचार पर चर्चा की तो उन लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और हंसने लगे। उन्हें विश्वास में लेना पड़ा कि यह परियोजना समाज में उनकी स्थिति में सुधार लाने में मदद करेगी।

पूर्णिमा ने कहा कि इलाकों और दीवारों का चयन अनुभवों का संयोजन है। उन्होंने कहा कि कभी-कभी हमारे मनमुताबिक चीजें नहीं होतीं और हमें जो मिलता है, उसी पर चित्रकारी कर लेते हैं, लेकिन ज्यादातर अपनी पसंद की दीवारें पाने में खुशकिस्मत रही हैं, जो उन जगहों के नजदीक होती हैं, जहां किन्नर रहते हैं और उनके लिए जागरूकता फैलाना आसान होता है।

शांति ने दुखी स्वर में कहा कि किन्नरों के अधिकारों की रक्षा संबंधी विधेयक लागू होने के बाद भी भारत में इस समुदाय को समाज में कम स्वीकृति मिली है। शिक्षा व स्वास्थ्य समुदाय के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन्हें बाहर रखा गया है।

वहीं, शोनाली ने कहा, “कला बदलाव ला सकती है। जब भी लोग इसे देखेंगे, तो कम से कम हमारी समस्याओं के बारे में सोचेंगे, जिनका सामना हम अपनी जिंदगी में कर रहे हैं और इससे शायद उन लोगों का हमारे प्रति नजरिया भी बदल जाए।”

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