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पहले तय हो… विरोध मोदी का हो या मुद्दों का… !

पहले तय हो… विरोध मोदी का हो या मुद्दों का… !

सहारनपुर : कुछ लोगों को ये भ्रम है कि भारत माता की जय बोलना देशभक्ति का प्रमाण नहीं हो सकता है।मैं यह मानता हूँ कि हम किसी से जबरिया कोई नारा नहीं लगवा सकते है और कदाचित मैं ऐसा करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हूँ।क्योंकि यह वह नारा है जो हृदय की गहराइयों में जन्म लेता है और प्रस्फुटित होने के बाद आकाश को गुंजायमान कर देता है।असल में यह नारा सिर्फ दिखावट के लिए लगाना इतना भी आसान नहीं है, जितना कि कुछ लोगों को लगता है।यदि सिर्फ यह नारा लगाने मात्र से कोई देशभक्त हो जाता तो फांसी की सजा से अंतिम समय तक बचने के पुरजोर उपाय करने वाला अफज़ल यह नारा सबसे पहले और ऊँची आवाज से लगाता।उमर खालिद भी ऊँचे सुर में यह नारा बुलंद करता। देवबंदी फतवे में भारत माता की जय का नारे न लगाने के लिए जो तर्क दिया है, वह यह है कि “क्योंकि हम इस वतन को अपना खुदा नहीं मानते है। इसलिए भारत माता की जय नहीं बोल सकते है!” मेरा यहाँ यह सवाल है कि यदि सिर्फ जय बोलने मात्र से किसी संज्ञा को खुदा का दर्ज़ा मिल सकता है तो फिर हिन्द की जय ही कैसे बोली जा सकती है ?

यदि ओवैसी जैसों को भारत माता की जय बोलने से ही दिक्कत होती तो उनका यह तर्क होना चाहिए था कि “मैं भारत माता(देवी?) की जय नहीं बल्कि भारत की जय बोलूंगा, हिन्द की जय बोलूंगा।”
  दरअसल भारत माता की जय में ओवैसी जैसों के लिए एक गहरा दर्द छुपा है और वह है-” जड़ों से जुड़ने का दर्द”..!
“भारत माता की जय” उदघोष असल में सांस्कृतिक है न कि राजनीतिक (अब यह बात अलग है कि ओवैसी ने इसका राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है )। यह वह नारा है जिसका भारतीय मुस्लिमों की पूर्ववर्ती पीढ़ियों ने किया है।इसलिए यह नारा निश्चित रूप से पिछली पीढ़ियों से वर्त्तमान पीढ़ी का सम्बन्ध स्थापित करता है। यही घृणित राजनीति करने वाले लोग नहीं चाहते है। यही वह नारा है जो देश के मुस्लिमों को सांस्कृतिक रूप से यहाँ के हिन्दू समाज के साथ समरस कर सकता है। जैसा कि इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे दक्षिण पूर्वी देशों में हुआ है।भारत माता की जय के उदघोष को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल करना वोट बैंक की राजनीती की सैद्धांतिक तौर पर पुष्टि करता है।भारत में वोट बैंक की राजनीति का आवश्यक तत्व ही यह है कि समस्त भारतीय मुस्लिम समाज को हर हाल में सांस्कृतिक रूप से यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दू समाज से काट कर रखा जाए।असल में जड़ों से जुड़ने का सुख हर किसी की किस्मत में नहीं होता है।दक्षिण अफ्रीका में सदियों पहले बस चुका “गिरमिटिया” समाज आज भी बहराइच जैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलो एवम् शेष भारत में आपको भटकता मिल सकता है।मैंने खुद दक्षिण  अफ़्रीकी प्रोफ़ेसर ब्रिज महाराज को ऐसे ही अपनी जड़े ढूंढते हुए देखा है।उ.प्र. सरकार ने भी जड़ से कटे ऐसे लोगों, जिनके पुरखे सैंकड़ो वर्ष पहले दक्षिण अफ्रीका, गिनी, फिजी, सूरीनाम आदि देशों में बस गए थे। लेकिन उनके वंशज खुद की जड़ों से कालान्तर में कट गए है, के लिए Discover your roots योजना चलाई थी। ताकि ऐसे लोगों को उनकी जड़ो से जोड़ने में प्रदेश सरकार मदद कर सके।
        भारत की सांप्रदायिक समस्या की जड़ भी जड़ों में ही है।इसे समझने की जरूरत है। जहाँ जहाँ खून में राजनीति का नमक है,वहां वहां भारत माता की जय से कुछ लोगों को परेशानी है जैसे ओवैशी और देवबन्द । लेकिन जहाँ जहाँ खून में देश का नमक है वहां वहां भारत माता की जय से आकाश गूंजता है जैसे दिल्ली में सूफी सम्मेलन और सऊदी में भारतीय मुस्लिम महिलायें।।भारतीय संविधान के तहत किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी कार्य,चाहे वह धार्मिक हो या सामजिक, करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। “भारत माता की जय” बोलने का मतलब यह नही है कि किसी सड़क चलते व्यक्ति को पकड़ कर मैं कहने लगू कि “बोल भारत माता की जय,नहीं तो तुम देशद्रोही हो!” देश में कोई भी व्यक्ति या संस्था “देशभक्ति प्रमाणीकरण का प्राधिकरण नहीं है.” ।
भारत का बहुसंख्यक समाज एवं कई अल्पसंख्यक समाज भी, “माताभूमिपुत्रोहमपृथ्वीयाः अर्थात भारतभूमि मेरी माता और मैं इसका पुत्र हूँ,में विश्वास रखकर भारत भूमि को मातृभूमि मानता है। वह सगर्व भारत माता की जय बोलता है।
भारत माता की जय बोलने का जब कोई अवसर आये तो न बोलने वाले उस समय चुप रह सकते है। उनके ऐसा करने से  किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए।लेकिन ऐसे किसी अवसर पर भारत माता का उदघोष होने पर ,भारत माता की जय न बोलने का इच्छुक कोई आदमी चुप रहने के बजाय चिल्लाकर यह कहने लगे कि ” मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा तो इसका अर्थ साफ है कि वह जानबूझकर “सगर्व भारत माता की जय बोलने वालों की भावनाओं को चोट पहुँचाना चाहता है।
ऐसा कहना न केवल बहुसंख्यक भावनाओं पर चोट है वरन “राष्ट्र की हमारी संकल्पना को भी चुनौती देने के समान है.”। ऐसे व्यक्ति की देशभावना पर सन्देह स्वाभाविक है। क्या देश में कोई व्यक्ति या समाज ऐसा है जिसकी गर्दन पर किसी ने छूरी रखकर बोला हो कि “बोल भारत माता की जय” फिर “भारत माता की जय” पर अनावश्यक विवाद क्यों ? दरअसल, राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा इतनी ज्यादा है कि सत्ता विरोधी लोग यह तय नही कर पा रहे हैं कि विरोध मोदी का करना है या मुद्दें का?
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